यह पुस्तक महाराजजी की शिक्षा पालन करके लिखित हुआ । वह भक्ति व गोसेवा के प्रसंग में धर्म का, एकता का व आनुकूल्य का अर्थ देता है । जो गो श्रीकृष्ण के आराध्य हैं उन गो की पवित्रता को समझाकर यह पुस्तक गो का कृष्ण के साथ अतिसुंदर संबंध दिखाता है । गो के सात्तविक गुणों पर ध्यान देकर लेखक यह दर्शाते हैं कि इस उत्तम प्राणी से प्रेरणा लेकर भौतिकतावादी समाज के दुष्ठताएँ किस तरह से वशीभूत कर ली जा सकती हैं ।
यह पुस्तक श्री हरिदास निवास व उसके संस्थापक श्री हरिदास शास्त्री महाराजजी का वर्णन भी करता है । वहाँ यह दिखाया जाता है कि सच्ची गोसेवा कैसे की जाए और आश्रम व दो गोशालाओं का विवरण देता है । आश्रम को आध्यात्मिक अध्ययन के लिए उपयुक्त स्थान रूप में भी दिखाता है ।