हमारे पथ में शास्त्र अत्यवश्यक हैं क्योंकि वे दिखाते हैं कि भगवान कौन हैं, उनसे हमारा संबंध क्या है, और हमारा प्रयोजन व अभिधेय क्या है ।
जो कृष्ण सत्त्व, रजस व तमस के बाहर होकर भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा व करणापाटव चार दोषों से रहित हैं उनसे ही शास्त्रों का उद्भव है । केवल ये पुस्तक आध्यात्मिक मार्ग-दर्शक रूप में हमको अपने भौतिक व गलत विचार से मुक्त कर सकते हैं ।
वृंदावन में आने पर हमारे परम्गुरुदेवजीने देखा कि अनेक गौडीय वैष्णव ग्रंथ लुप्त होनेवाले थे और जो शास्त्रीय संस्कृति वृंदावन में श्री चैतन्य व छह गोस्वामियोंने स्थापित की गयी थी वह प्रायः मिट गयी थी । शास्त्रों का बड़ा पण्डित होकर उनहोंने लगातार इस संस्कृति को पुनर स्थापित करने के लिए बहुत प्रयत्न किया, और महाराजजी उनका दृष्टांत अनुसरण करते हैं ।
अपने श्री गदाधर-गौरहरि प्रेस को प्रतिष्ठित करके महाराजजी शास्त्रों की लुप्त होने से रक्षा करते हैं । वह उनका संकलन, संपादन व अनुवाद करते हैं और उनके आरंभिक संदेश को परिरक्षित करने के लिए उन पर टीकाएँ लिखते हैं । पुस्तकों का मुद्रण व वितरण भी अवश्य होता है । इसके अलावा आपने “श्री गौर-गदाधर ग्रंथागारम” का निर्माण भी किया जो अब दस हज़ार से अधिक ग्रंथ रखते है । उन में से कई विरले पाण्डुलिपियाँह विद्यमान हैं ।
संस्कृत अज्ञ व्यक्तियों के लिए जो महाराजजी के अपने हिंदी व बंगाली अनुवादों के द्वारा शास्त्रों का सच्चा अर्थ दिखाने के प्रयत्न हैं वे अपने शिष्यों के रचित भिन्न भिन्न अनुवादों के द्वारा बढ़ाये जा रहे हैं ।
जो पुस्तक श्री गदाधर-गौरहरि प्रेस से प्रकाशित हुई और आश्रम से उपलब्ध हैं, उनकी सूची यहाँ देख जा सकती है । “पुस्तक” नामक अनुभाग में उनके बारे में अधिक जानकारियाँ मिलती हैं । उन कुछ पुस्तकों की समीक्षा यहाँ हुई । यदि आप किसी को पाना चाहते हैं तो हमारे साथ संपर्क कीजिए ।